मुबई: देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ 3 महीनों में महाराष्ट्र में 767 किसानों ने आत्महत्या कर ली। ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि 767 टूटे हुए परिवारों की कहानी है — घर के इकलौते कमाने वाले ने जब जिंदगी से हार मान ली, तो पीछे सिर्फ कर्ज और आँसू बचे।विपक्ष और किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार किसानों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही। कर्ज, महंगे बीज, खाद, डीज़ल की कीमतें, और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की गारंटी न होना – ये सभी कारण किसानों की आत्महत्या के पीछे बताये जा रहे हैं। किसान जब कर्जमाफी की मांग करते हैं, तो उन्हें अनसुना कर दिया जाता है। लेकिन वहीं जिनके पास पहले से करोड़ों हैं, उनके लोन आसानी से माफ कर दिए जाते हैं। आज ही की एक खबर में सामने आया कि अनिल अंबानी पर ₹48,000 करोड़ का SBI फ्रॉड दर्ज हुआ है, जिसे लेकर अब कई सवाल उठ रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2017 में कहा था कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी कर दी जाएगी। लेकिन 2025 में हालात उलटे नजर आ रहे हैं — किसानों की आमदनी बढ़ने के बजाय, उनकी ज़िंदगी ही आधी हो रही है।विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार PR (जनसंपर्क) और प्रचार पर ज़्यादा ध्यान देती है, जबकि असल मुद्दों पर चुप्पी साध लेती है। किसान आज भी आत्महत्या कर रहा है, लेकिन सरकार की प्राथमिकता कहीं और है। देश के कई हिस्सों में किसान आंदोलनों की तैयारी भी चल रही है। पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से आ रही रिपोर्ट्स बताती हैं कि किसान फिर से सड़कों पर उतरने को तैयार हैं। यह कोई आकस्मिक संकट नहीं है, बल्कि एक धीरे-धीरे चलता हुआ सिस्टमेटिक संकट है, जो किसान को अंदर ही अंदर खत्म कर रहा है। अब सवाल है — कब तक अन्नदाता की पुकार यूँ ही अनसुनी होती रहेगी? क्या सरकार जागेगी या फिर PR और नारों के बीच ही किसान की मौत भी गुम हो जाएगी?































