झारखंड: अस्पताल की इमरजेंसी में हर मिनट किसी की सांसें चलती हैं, किसी की धड़कन लौटती है और किसी परिवार की उम्मीद फिर से जिंदा होती है। इन उम्मीदों को थामे रखने वाले हाथ डॉक्टरों के होते हैं। हर साल 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस ऐसे ही डॉक्टरों के सम्मान में मनाया जाता है।
भारत के महान चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र राय की जयंती एवं पुण्यतिथि पर मनाया जाने वाला यह दिन केवल डॉक्टरों के योगदान को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की असल तस्वीर को समझने का भी दिन है। झारखंड में यह तस्वीर सेवा, समर्पण और संघर्ष तीनों का मेल है।
झारखंड के सरकारी और निजी अस्पतालों में हर दिन हजारों डॉक्टर लाखों मरीजों के इलाज में जुटे रहते हैं। सड़क दुर्घटनाओं से लेकर हार्ट अटैक, कैंसर, किडनी रोग, प्रसव, नवजात शिशुओं की देखभाल और मौसमी बीमारियों तक, हर चुनौती के बीच डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कोरोना महामारी के दौरान भी राज्य के डॉक्टर कई दिनों तक घर-परिवार से दूर रहकर अस्पतालों में डटे रहे। उस दौर ने यह साबित किया कि किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी इमारतें नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी होते हैं।
लेकिन, डॉक्टर डे ऐसे समय आ रहा है, जब झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था कई चुनौतियों से एक साथ जूझ रही है। सबसे बड़ी चुनौती विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। इसको देखते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2026 में 666 विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए झारखंड लोक सेवा आयोग (IPSC) को अधियाचना भेजी है।
इनमें 226 फिजिशियन, 224 शिशु रोग विशेषज्ञ, 57 एनेस्थेटिस्ट, 28 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 28 रेडियोलॉजिस्ट और 24 सर्जन के पद शामिल हैं। इन रिक्तियों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं की कितनी जरूरत है।
राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल रिम्स भी इसी चुनौती का सामना कर रहा है। पूरे झारखंड से गंभीर मरीजों की पहली उम्मीद बनने वाले इस संस्थान में डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी लंबे समय से बनी हुई है। जून 2024 में रिम्स ने 259 डॉक्टर एवं फैकल्टी पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की। इनमें 150 सीनियर रेजिडेंट, 10 ट्यूटर और 99 फैकल्टी पद शामिल थे। इसके बावजूद, संस्थान में मानव संसाधन की कमी पूरी तरह दूर नहीं हो सकी।
झारखंड हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश आंकड़ों ने भी रिम्स की स्थिति को सामने रखा। डेंटल कॉलेज में 145 फैकल्टी पद, नर्सिंग स्टाफ के 144 पद, पैरामेडिकल स्टाफ के 44 पद और ग्रुप-डी कर्मचारियों के 418 पद रिक्त हैं।
तत्कालीन रिम्स निदेशक प्रो. (डॉ.) राजकुमार ने भी कहा था कि संस्थान में डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल, तकनीकी और ग्रुप-डी कर्मचारियों सहित करीब 3,500 मानव संसाधन की कमी है।
रिम्स की व्यवस्था को सुधारने के लिए झारखंड हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने भर्ती, आधारभूत संरचना, चिकित्सा उपकरणों की खरीद, भवनों के जीर्णोद्धार और अन्य सुधारों सहित आठ महत्वपूर्ण कार्य 30 मई 2026 तक पूरे करने का निर्देश दिया था। तत्कालीन निदेशक ने अतिरिक्त समय मांगा, जिसके बाद अदालत ने इसे अंतिम अवसर बताते हुए समयसीमा तय कर दी।
हालांकि, 30 मई गुजरने के एक महीने बाद भी आठ में से केवल एक निर्देश रिम्स परिसर को अतिक्रमण मुक्त कराने का ही पालन हो सका। फैकल्टी नियुक्ति पूरी नहीं हो सकी। फरवरी से अप्रैल के बीच केवल असिस्टेंट प्रोफेसरों के इंटरव्यू हुए, लेकिन अंतिम चयन सूची अब तक जारी नहीं हो सकी।
सीनियर रेजिडेंट और ट्यूटर के कई पद अभी भी खाली हैं। तृतीय वर्ग की नियुक्ति लंबित है। जबकि, नर्सिंग के 144 पदों के लिए विज्ञापन तक जारी नहीं हुआ। चतुर्थ वर्ग के 596 स्वीकृत पदों में केवल 94 कर्मचारी कार्यरत हैं। वार्ड बॉय, ट्रॉलीमैन, ड्रेसर और सफाईकर्मियों की कमी के कारण अस्पताल का बड़ा हिस्सा आज भी आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है।
कई विभागों में जरूरी मशीनों, वेंटिलेटर और दवाओं की उपलब्धता भी अब तक चुनौती बनी हुई है। इन आंकड़ों का असर केवल कागजों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव डॉक्टरों और मरीजों दोनों पर पड़ता है। जब डॉक्टर कम होते हैं तो एक ही चिकित्सक को ओपीडी, वार्ड, इमरजेंसी, ऑपरेशन थिएटर और कई बार प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं।
जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ नहीं होने पर मरीजों को रिम्स या दूसरे बड़े अस्पतालों में भेजना पड़ता है, जिससे वहां मरीजों का दबाव और बढ़ जाता है।
ग्रामीण झारखंड की तस्वीर और अलग है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। कई जगह आधुनिक जांच उपकरण नहीं हैं, कई स्थानों पर विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं और गंभीर मरीजों को रेफर करना ही एकमात्र विकल्प बचता है। बरसात के मौसम में दूर-दराज के गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना भी डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए आसान नहीं होता।
इसी बीच, जून 2026 में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए कई निर्देश दिए। उन्होंने एएनएम और जीएनएम के रिक्त पदों पर जल्द नियुक्ति, डॉक्टरों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की बहाली पूरी करने, एआई आधारित कॉल सेंटर शुरू करने, ओला-उबर की तर्ज पर एम्बुलेंस नेटवर्क विकसित करने, रेफरल सिस्टम का ऑडिट कराने, अस्पतालों की स्वच्छता सुनिश्चित करने, मुख्यमंत्री अस्पताल कायाकल्प योजना को तेज करने, मेडिकल कॉलेजों में यूजी और पीजी सीटें बढ़ाने, ब्लड सेपरेशन यूनिट स्थापित करने, अबुआ दवाखाना शुरू करने और मेडिकल कॉलेजों में रिहेबिलिटेशन सेंटर विकसित करने सहित कई निर्देश दिए।
झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार बदल रही है। नए मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं, चिकित्सा शिक्षा का विस्तार हो रहा है, अस्पतालों में नई सुविधाएं जुड़ रही हैं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। लेकिन, दूसरी ओर रिक्त पद, बढ़ता मरीजों का दबाव और अधूरी आधारभूत सुविधाएं यह भी बताती हैं कि अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।
































