झारखंड के खूँटी जिले से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहाँ वन विभाग पर मजदूरों को नकली नोटों से भुगतान करने का गंभीर आरोप लगा है। यह मामला जिले के तोरपा थाना क्षेत्र के एरमेरे गांव का है, जहाँ वन विभाग द्वारा 25,000 पौधों के रोपण कार्य के तहत मजदूरों की भर्ती की गई थी।

 मामला कैसे सामने आया?

इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब मजदूरों को ‘मनोरंजन बैंक’ के नकली नोट दिए गए और उन्होंने इन्हें लेकर स्थानीय दुकानों पर खर्च करने की कोशिश की। दुकानदारों ने इन नोटों को देखकर तुरंत इनकी वैधता पर सवाल उठाया और बताया कि ये नोट तो बिलकुल नकली हैं, जिन पर “Only for Movie Use” या “Children Bank of India” जैसे शब्द छपे हुए थे। इससे यह स्पष्ट हो गया कि ये नोट सिर्फ मनोरंजन या फिल्म शूटिंग के लिए बनाए गए थे, जिनकी कोई कानूनी वैधता नहीं है।

 मजदूरों और ग्राम प्रधान का आरोप

गांव के ग्राम प्रधान बर्नार्ड आइंद ने आरोप लगाया है कि वनरक्षी राहुल कुमार महतो ने रविवार की शाम उन्हें नकली नोटों का एक बंडल सौंपा और कहा कि इसे मजदूरों में बांट दिया जाए। प्रधान का कहना है कि उन्होंने पहले इन नोटों को सामान्य ही समझा, लेकिन बाद में जब मजदूरों ने शिकायत की और दुकानों पर इन नोटों को कोई मान्यता नहीं मिली, तो पूरा मामला सामने आया।

 वन विभाग ने आरोपों को किया खारिज

दूसरी ओर, वन विभाग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। विभाग के अनुसार, यह एक साजिश है, और कुछ लोग जानबूझकर विभाग को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि मजदूरों को उनके श्रम के बदले समुचित और वैध भुगतान किया गया है, और जो नोट सामने लाए गए हैं, वे किसी अन्य उद्देश्य से लाए गए होंगे।

 सबूत और सवाल

इस पूरे मामले ने वन विभाग की नैतिकता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर मनोरंजन बैंक के नोटों की तस्वीरें भी वायरल हो रही हैं, जिससे लोगों में गुस्सा और नाराजगी देखने को मिल रही है। सवाल यह भी उठता है कि यदि यह नोट विभाग ने नहीं दिए, तो ये गांव तक पहुंचे कैसे?

 प्रशासन की चुप्पी, जाँच की मांग

अब तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्थानीय लोग जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि मजदूरों को इस तरह से ठगा गया है, तो यह न केवल अमानवीय कृत्य है बल्कि कानूनी अपराध भी है। यह घटना राज्य की सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मजदूरों के साथ घोर अन्याय और धोखाधड़ी का मामला होगा। वहीं यदि यह आरोप झूठे हैं, तो यह एक गंभीर षड्यंत्र बन सकता है। दोनों ही परिस्थितियों में सच्चाई सामने लाना और दोषियों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है।

 

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