झारखंड की मिट्टी का पर्व दसई नेग का गूंज

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रांची: झारखंड की राजधानी में दुर्गा पूजा का उत्सव हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। श्रद्धालुओं को दर्शन कराने के लिए सैकड़ों भव्य पंडाल बनाए गए है, जहां मां दुर्गा के नौ स्वरूप की प्रतिमाएं स्थापित किए गए है। वहीं, दूसरी ओर छोटानागपुर का पठार इन दिनों आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की झलक से सराबोर है। यहां संथाल, मुंडा और हो समुदाय के बीच दसई नेग पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है, जो पूर्वजों से प्राप्त संस्कृति को निर्वाह कर रहे है। यह पर्व आदिवासी जीवन से जुड़ा है।

इनकी सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक उत्सव का प्रतीक माना जाता है। खूंटी के लोक कलाकार रविन्द्र सिंह मुंडा ने बताया कि संथाल परगना, खूंटी, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला जैसे जिलों के गांव-गांव में इस पर्व को हर्षोल्लास से मना रहे है। दसई नेग केवल झारखंड की मिट्टी में मनाया जाता है। यह आदिवासियों की धरोहर है, इसे किसी अन्य राज्य में नहीं मनाया जाता है।

आदिवासियों का हर घर और आंगन इस उत्सव का है हिस्सा

रविन्द्र सिंह मुंडा ने बताया कि इसमें सामूहिक नृत्य होती है। पुरुष वर्ग रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनकर 3 दिन से लेकर 10 दिनों तक लगातार नृत्य करते हैं। यह नृत्य अखाड़े में नहीं बल्कि गांव के किसी भी व्यक्ति के आंगन में हो सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है कि हर घर, हर आंगन इस उत्सव का हिस्सा बन सकता है।

करम नेग भी जुड़ा है परंपरा से

छोटानागपुर के कुछ हिस्सों में दसई नेग के मौके पर मुंडा समुदाय करम नेग भी आयोजित करता है। इसमें पुरुष और महिलाएं दोनों अखाड़े में पूरी रात झूमते-नाचते हैं। नगाड़े और मांदर की थाप पर गूंजता यह सामूहिक नृत्य समुदायिक एकता और भाईचारे का अनोखा संदेश देता है।

आदिवासी समाज की जीवन शैली को करता है प्रदर्शित

रविन्द्र सिंह मुंडा ने कहा कि दसई नेग का इतिहास आदिवासी जीवन में खास माना जाता है। यह केवल नृत्य या उत्सव भर नहीं है, यह पर्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान की गवाही है। इस पर्व के जरिए आदिवासी समाज अपनी एकजुटता, परिश्रम और सामूहिक जीवनशैली को प्रदर्शित करता है।

दसई नेग है दशहरा से अलग

दसई नेग का दशहरा पर्व से कोई संबंध नहीं है। यह पूरी तरह से अलग परंपरा है और केवल झारखंड के आदिवासी समुदाय द्वारा ही मनाई जाती है। इसमें आदिवासी घरो के आंगन में सामूहिक रूप से नृत्य करते है। इसके बदले में घर के परिवार के द्वारा चावल समेत अन्य चीजें दान में देते है। इस पर्व के बाद से आदिवासी परिवार ओल का सेवन करना शुरू करते है। यह पर्व राज्य की सांस्कृतिक धरोहर है। आदिवासी समाज इसे विशिष्ट पहचान के रूप में मनाते हैं।

यह पर्व नगाड़ा की धुन और मांदर की थाप से गुंजती है। पारंपरिक धुन से युवा पीढ़ी और बुजुर्ग झूमते-नाचते है। आधुनिकता के युग में आदिवासी समाज इस परंपरा को बचाकर रखे हुए हैं और अपनी परंपरा और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे है।

 

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