भारत: तिरंगा, तकदीर और तिकड़म, बात 1994 की है। बाबरी ध्वंस के बाद देश में कई मुस्लिम प्रॉपर्टीज पर विवाद खड़ा करने में बड़े बड़े नेता लगे थे। उमा भारती भी बड़ी नेता थीं। तो कर्नाटक के हुबली स्थित ईदगाह मैदान में उमा भारती तिरंगा फहराने पहुंची। ईदगाह अंजुमन-ए-इस्लाम नामक संस्था की संपत्ति थी। पर स्थानीय हिन्दूवादी नेताओ का कहना था कि वह नगर निगम की संपत्ति है। विवाद में झड़पें हुई। तनाव भड़का, कर्फ्यू लगा। कर्फ्यू तोड़कर उमा ने रैली की, भाषण दिया। दंगे भड़क गए. 6 लोग मरे। व्यापक हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी हुई।
उमा पर दंगा भड़काने, हत्या का प्रयास (IPC 307), और आगजनी (IPC 436) जैसे आरोप लगे। वे मामले में मुख्य आरोपी थीं। मामला हाई प्रोफाइल था। जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गयी। यहां तक कि 2002 में कांग्रेसी मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा की सरकार ने इस मामले को वापस लेने की कोशिश की, पर अदालत ने अस्वीकार कर दिया।
2003 में उमा का राजनीतिक सितारा बुलंदी पर था। 10 साल से जमे मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को चुनौती देने के लिए, मध्यप्रदेश भाजपा की कमान उन्हें मिली। फायरब्रांड नेता ने अधमरी भाजपा को बब्बर शेर बना दिया। बड़े बहुमत से जीतकर, प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई।
लेकिन करम फूटे हों, तो क्या कीजे? कौन जाने किसकी प्रेरणा से, हुबली की अदालत ने 2004 में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। ध्यान रहे, ये कोई दोष सिद्धि नही थी। दरअसल कोर्ट के दर्जनो सम्मन्स और जमानती वारंट के बावजूद, पेश न होने के कारण गैर जमानती वारंट आया था। ये रूटीन प्रक्रिया है। रस्मी गिरफ्तारी के बाद, उन्हें कोर्ट में पेश किया जाता। फिर वे जमानत के विकल्प आजमा सकती थी।
CM सीएम रहते हुए वे कर्नाटक कोर्ट में जाने में कोई बाधा नही थी। लेकिन पार्टी में उनके दुश्मन सक्रिय थे। दबाव डाला गया कि इस्तीफा दें, बरी होने के बाद मुख्यमंत्री बनें। चौतरफा दबाव में उमा ने इस्तीफा दिया। अपने चमचे बाबूलाल गौर को गद्दी पर,अपना खड़ाऊं समझकर रख गईं।
कानूनी राहत के बाद, मध्यप्रदेश लौटी, तो गौर ने गद्दी खाली करने से इनकार कर दिया। भन्नाई उमा ने गौर के खिलाफ जिहाद छेड़ दिया. आखिर चुनावी नतीजा, मैंडेन्ट उनके लिए था, गौर के लिए नहीं. खींचतान में दोनों हारे। लॉटरी शिवराज सिंह चौहान के हाथ लगी।
उमा इसके बाद भी भाजपा में रहीं। बाहर जाकर पार्टी बनाई, वापस भाजपा में मिलाई। लोकसभा जीतीं, केंद्र में मंत्री हुई। पर वह उमा का निस्तेज अवतार था। उनमें न फायर बचा था, न ब्रांड। उनका करियर, एक वारंट ने समाप्त कर दिया।
तो आज यह किस्सा क्यो याद आया? इसलिए, कि मुख्यमंत्रियों पर मुकदमे लादने और गिरफ्तार कराकर, बिना जमानत, कई माह जेल में रखने की ताकत तो गृहमंत्री के हाथ थी। लेकिन पद से हटाने की नहीं। आज उन्होंने आनन फानन में एक बिल ड्राफ्ट करके, सदन के पटल पर धर दिया है। अब किसी भी सरकार या सीएम को मिटाने की ताकत, उनकी मुट्ठी में आ जायेगी। चूंकि एजेंसियां उनके हाथ मे हैं। तो ये अमित शाह की निजी ताकत होगी।
ऐसे में उमा केस से समझना चाहिए कि कानून सिर्फ विरोधी मुख्यमंत्री नही, भाजपा के अपने लोगों पर भी लागू होगी। बल्कि अपनों के तो लंबे चौड़े डोजियर गृहमंत्री के पास हैं। पुख्ता सबूतों, गहरी जानकारी के साथ के साथ। क्योकि अधिकांश कर्म कुकर्म उन्हीं के निर्देश और जानकारी में कराये गए होंगे।
तो जहां आम धारणा यह है कि इस कानून को विपक्ष की सरकारें गिराने के लिए इस्तेमाल किया जाना है। या उपराष्ट्रपति चुनाव के पहले यह नायडू नीतीश जैसों को नाथने की चाल है, तो यह बेहद सीधा सपाट प्रोजेक्शन हैं। विपक्ष की सरकारें फिलहाल भाजपा को खतरा नही और नायडू नीतीश को संभालने के उनके पास बहुतेरे औजार मौजूद हैं।
इस कानून का निशाना तो भाजपा के अपने मंत्री- मुख्यमंत्री होंगे. ये मुख्यमंत्री योगी या शिवराज, गडकरी, राजनाथ जैसे सभी केंद्रीय मंत्रियों को रास्ते से हटाने का औजार है, जो प्रधानमंत्री बनने की रेस में कूद सकते हैं। शाह के शहंशाह बनने में रोड़ा हो सकते हैं।
भाजपा में पोस्ट मोदी युग की तैयारी चल रही है। तब अमित शाह अपने सशक्त प्रतिद्वंदियों को हाथ जोड़कर या दिल जीतकर किनारे नही लगाएंगे। वे इस ताकत का उपयोग करेंगे।
इंटरेस्टिंग यह है कि इस कानून में प्रधानमंत्री तक को लपेटा गया है। खुदा ही जाने अमित शाह के तिकडमी मस्तिष्क में क्या-क्या चल रहा है, जो भी चले। उनका इतिहास, राजनीतिक शैली और जबरजस्त तैयारी बताती है उनके और लाल किले पर तिरंगा लहराने के बीच खड़े किसी भी रोड़े की तकदीर में एफआइआऱ, गिरफ्तारी और कम से कम 31 दिन की जेल लिखी हुई है।





























