चेन्नई – दक्षिण भारत की रसोई से निकला एक ऐसा स्वादिष्ट व्यंजन जो अब पूरे देश में चहेता बन चुका है – सांभर वड़ा। लेकिन इस बार चर्चा इसके स्वाद की नहीं, बल्कि उसकी खास बनावट की है। जी हां, वड़े के बीच बने गोल छेद की बात हो रही है, जिसे देखकर बच्चों से लेकर बड़े तक हैरान रहते हैं – आखिर ये छेद क्यों होता है?

पकाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका
खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार, वड़े के बीच यह छेद केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि इसके पीछे खास वैज्ञानिक कारण छिपा है। खाद्य वैज्ञानिक डॉ. वी. श्रीधरन बताते हैं, “वड़े के बीच का छेद इसे चारों ओर से समान रूप से पकने में मदद करता है। इससे यह न केवल बाहर से कुरकुरा बनता है, बल्कि अंदर से भी अच्छी तरह पकता है।”तेल में तलते वक्त अगर वड़ा ठोस और मोटा हो, तो उसका अंदरूनी हिस्सा कच्चा रह सकता है। लेकिन छेद होने से गर्म तेल वड़े के बीच से भी गुजरता है, जिससे वह पूरी तरह से फ्राई होता है।
समय और तेल की बचत
खबरों के अनुसार, दक्षिण भारत में बड़े स्तर पर वड़े बनाते समय यह शेप बेहद कारगर साबित होती है। इससे वड़ा जल्दी पकता है, कम तेल सोखता है और हल्का रहता है।
सर्विंग में भी होती है सहूलियत
रेस्तरां और होटल संचालक बताते हैं कि इस गोलाकार वड़े को छेद के जरिए पकाने और परोसने में भी सुविधा होती है। इसे बड़ी मात्रा में बनाते वक्त संभालना आसान होता है।
डिश की पहचान बन चुकी है यह शेप
अब यह छेद वड़े की पहचान बन चुका है। खाने के शौकीन लोग भी इसे ‘डोनट वड़ा’ कहने लगे हैं। वहीं कुछ क्षेत्रों में बिना छेद वाले वड़े भी मिलते हैं, जिन्हें बोंडा या कटलेट वड़ा के नाम से जाना जाता है।
जनमानस की प्रतिक्रिया
चेन्नई के प्रसिद्ध भोजनालय ‘मुरुगन इडली’ के एक ग्राहक श्री राममोहन ने बताया, “मैंने हमेशा सोचा था कि यह डेकोरेशन के लिए होता है, लेकिन आज असली वजह जानकर वाकई दिलचस्प लगा।” परंपरा और विज्ञान का यह मेल एक बार फिर साबित करता है कि भारतीय रसोई केवल स्वाद की नहीं, बल्कि सोच की भी मिसाल है। अगली बार जब आप सांभर वड़ा खाएं, तो उसकी बनावट को सराहना न भूलें।































