“हमने जिस सिनेमा हॉल में ‘शोले’ देखी, उसकी स्क्रीन इतनी बड़ी थी कि फ़िल्म देखने के लिए दर्शकों को दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ सिर घुमाना पड़ता था।” यह क़िस्सा सुनाने वाले नेपाल के वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक और ‘शोले’ के ज़बरदस्त फ़ैन विजयरत्न तुलाधर हैं।
विजयरत्न बचपन के अपने उन नेपाली दोस्तों के क़िस्से सुनाते हैं जो 200 किलोमीटर दूर बस से सफ़र करके ‘शोले’ देखने भारत जाते थे और लौटकर लंबी-लंबी डींगें हाँकते थे। मानो सूरमा भोपाली क़िस्सागोई कर रहे हों। उन दिनों अभिनेता धर्मेंद्र की किसी टिप्पणी से नाराज़गी की वजह से उनकी फ़िल्मों पर नेपाल में पाबंदी थी। लिहाज़ा ‘शोले’ पर भी पाबंदी थी।
























