झारखंड में खनिजों की खोज में सुस्ती: 36% योजनाएं बंद, 31% पूरी

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झारखंड में खनिजों की खोज का काम बुरी तरह प्रभावित है। 5 वर्ष (2017-22) के दौरान खनिजों की खोज के लिए शुरू की गयी योजनाओं में से सिर्फ 31 प्रतिशत योजनाओं पूरी हो सकी। 36 प्रतिशत योजनाओं को विभिन्न कारणों से बंद करना पड़ा या बीच में ही छोड़ देना पड़ा।

 

*नो माइनिंग जोन में खनिजों की खोज की योजना बनाना एक बड़ा कारण*

खनिजों की खोज की योजनाओं को बंद करने के महत्वपूर्ण कारणों में नो माइनिंग जोन में खनिजों की खोज की योजना बनाना, वन विभाग द्वारा सहमति देने में देर करना और मैन पावर की कमी शामिल है। महालेखाकार द्वारा खनिजों की खोज की प्रारंभिक ऑडिट के दौरान इन तथ्यों की जानकारी मिली है।

 

*राज्य के राजस्व में खनिजों का बड़ा योगदान*

राज्य के राजस्व में खनिजों से मिलने वाले राजस्व का बहुत बड़ा योगदान है। वाणिज्य कर से मिलने वाले राजस्व के बाद खनिज राज्य का दूसरा बड़ा आय का स्रोत है। माइनिंग के लिए सबसे पहले खनिजों की खोज की जाती है।

 

*खनिजों की खोज को रफ्तार देने के लिए सरकार ने बनाया बोर्ड*

खनिजों की खोज को रफ्तार देने के लिए सरकार ने वर्ष 2001 में झारखंड स्टेट जियोलॉजिकल प्रोग्रामिंग बोर्ड बनाया। बोर्ड ने 2016-17 से 2021-22 तक की अवधि में खनिजों की खोज की कुल 78 योजनाएं बनायी। लेकिन सिर्फ 24 योजनाएं ही पूरी की जा सकीं। 20 योजनाओं में खनिजों की खोज का काम जारी है। 28 योजनाएं शुरू ही नहीं की जा सकीं या बंद कर दी गयीं।

 

*वन विभाग की सहमति में देरी से प्रभावित हुआ काम*

पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोआमुंडी में खनिज खोजने से जुड़ी एक योजना चार साल बाद भी पहले चरण (स्टेज-1) से आगे नहीं बढ़ सकी। वन विभाग की सहमति में देरी के कारण यह योजना प्रभावित हुई है।

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