राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स (RIMS) का इमरजेंसी वार्ड गंभीर कुव्यवस्था का शिकार हो गया है। यहां इलाज की हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि मरीजों का भरोसा अब भगवान और निजी मेडिकल दुकानों पर टिका हुआ है।
*न दवा, न केबिन, न इलाज*
इमरजेंसी वार्ड में पैरासिटामोल जैसी बुनियादी दवाएं, IV फ्लूइड्स और ब्लड ट्रांसफ्यूजन किट तक उपलब्ध नहीं हैं। मरीजों को जरूरी दवाएं और सामान न मिलने पर अस्पताल से बाहर निजी दुकानों पर भेजा जा रहा है, जिससे इलाज में देरी हो रही है और गरीब मरीजों पर खर्च का बोझ बढ़ता जा रहा है।
*गंभीर मरीजों के लिए नहीं है कोई प्राइवेट केबिन*
इमरजेंसी वार्ड में एक भी प्राइवेट केबिन नहीं है, जिससे गंभीर मरीजों का न ठीक से इलाज हो पाता है, न निगरानी। यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है।
*जूनियर डॉक्टरों का विरोध*
इन खामियों से तंग आकर रिम्स जूनियर डॉक्टरों की एसोसिएशन ने अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट को एक कड़ा पत्र लिखा है, जिसमें इन परेशानियों को विस्तार से बताया गया है। उन्होंने इसे तुरंत ठीक करने की मांग की है।
*डॉक्टरों की प्रमुख मांगें*
1. जरूरी दवाएं और मेडिकल किट्स हर समय उपलब्ध कराई जाएं।
2. सभी विभागों में मेडिकल सप्लाई की नियमित और मजबूत व्यवस्था बनाई जाए।
3. इमरजेंसी में गंभीर मरीजों के लिए प्राइवेट केबिन का तत्काल प्रावधान हो।
4. मरीजों की शिफ्टिंग और देखरेख के लिए पर्याप्त MPW की तैनाती की जाए।
*क्या होगा आगे?*
अब देखना यह है कि अस्पताल प्रशासन इन मांगों को कितनी जल्दी पूरा करता है और मरीजों को बेहतर इलाज प्रदान करने के लिए क्या कदम उठाता है। फिलहाल, मरीजों को भगवान भरोसे ही रहना पड़ रहा है।





























