रांची— झारखंड के जननायक और झारखंड आंदोलन के प्रमुख चेहरा शिबू सोरेन अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी विरासत और संघर्षों की गूंज सदियों तक याद की जाएगी। एक ऐसी आवाज जिसने सरकारों को झुका दिया, शोषित‑वंचितों के हक की लड़ाई लड़ी और झारखंड को पहचान दिलाई।

झारखंड आंदोलन से उभरी दिशोम गुरु की छवि
1944 में जन्मे शिबू सोरेन ने आदिवासी अधिकारों और जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को आवाज दी। उन्होंने आदिवासी समुदाय के भीतर चेतना जगाई और अलग झारखंड राज्य की माँग को लेकर निर्णायक भूमिका निभाई। इसी संघर्ष के बीच उन्हें “दिशोम गुरु” की उपाधि दी गई — यानी “जनता का मार्गदर्शक।”
दुमका से उनका अटूट रिश्ता
दुमका, जो संताल परगना की हृदयस्थली है, शिबू सोरेन की राजनीति की प्रयोगशाला रहा।
- आठ बार लोकसभा सांसद के रूप में दुमका का प्रतिनिधित्व कर उन्होंने दिल्ली में आदिवासी समाज की आवाज पहुंचाई।
- दुमका से उन्हें न सिर्फ चुनावी समर्थन मिला बल्कि उन्होंने यहां से अपने संगठनात्मक ढांचे को भी मजबूत किया।
- झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की जड़ें भी यहीं से मजबूत हुईं।
राजनीतिक सफर और उपलब्धियाँ
- केंद्रीय कोयला मंत्री के रूप में उन्होंने कोयला खनन क्षेत्र में स्थानीय हितों की बात उठाई।
- तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और राज्य के निर्माण के बाद उसकी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 38 वर्षों तक झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष रहे, और बाद में संस्थापक संरक्षक बने।
एक विचारधारा, एक आंदोलन
शिबू सोरेन केवल नेता नहीं, एक विचारधारा थे।
उनकी राजनीति आदिवासियों, किसानों और गरीबों के अधिकारों के इर्द-गिर्द घूमती रही।
उनका जीवन बताता है कि किस तरह एक किसान का बेटा संघर्ष करते हुए राष्ट्रीय राजनीति में मुकाम बना सकता है।





























