क्या आजकल की कंपनियां बन रही है पीएम की ब्रांडिंग एजेंसी?

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    साल 2016 की 8 नवंबर की रात में पीएम मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की और 10 नवंबर को पेटीएम का विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित हुआ। ऐसा लगा, पीएम मोदी पेटीएम का प्रचार कर रहे हैं। उस समय इसकी जबरदस्त आलोचना भी हुई थी।

    तीन सितंबर 2025 को जीएसटी काउंसिल ने जीएसटी दरों में कमी का ऐलान किया। अब देश की तमाम कंपनियां करोड़ों रूपये खर्च करके कीमतें कम होने का विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवा रही है। इन विज्ञापनों में पीएम मोदी की तस्वीर है। ऐसी होड़ रही है, जैसे कि कहीं ऐसा ना हो कि आगे चल कर कंपनियां अपने उत्पादों पर भी पीएम मोदी की तस्वीर लगाने लग जाये। कंपनियों के विज्ञापनों को लेकर अब यह कहा जाने लगा है कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कोई समस्या नहीं है। अब न्यू नॉर्मल यह है कि कॉरपोरेट सरकार की तारीफ करते हुए विज्ञापन चलवाये, जिसमें प्रधानमंत्री की फोटो हो।

    सवाल उठ रहे हैं

    जब कॉरपोरेट कंपनियां किसी नेता की ब्रांडिंग करने लगती है, तो सत्ता और पूंजी के बीच पारस्परिक लाभ का संदेह गहराता है। सरकार की नीतियों का उद्देश्य सुधार से कहीं अधिक राजनीतिक ब्रांडिंग तो नहीं है।

    हालात यह है कि भारत की बड़ी कंपनियां विज्ञापनों की वजह से “पीएम ब्रांडिंग एजेंसी” बनी गई है। जब टूथपेस्ट से लेकर कार तक के विज्ञापन में “मोदी जी का तोहफा आपके घर तक” लिखा जाने लगा है। ऐसा लगने लगा है कि जीएसटी में छूट ने कॉरपोरेट कंपनियों को चाटुकारिता का नया मौका दे दिया है।

    कानून की नजर से देखें तो विज्ञापनों में पीएम मोदी की तस्वीर का होना विज्ञापन मानकों का उल्लंघन है। एएससीआई (Advertising Standards Council of India) और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत विज्ञापनों में राजनीतिक व्यक्तियों की ब्रांडिंग को नियंत्रित करने का प्रावधान है। जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है- भारी उद्योग मंत्रालय ने ऑटो शोरूम्स को पीएम की फोटो वाले पोस्टर लगाने के निर्देश दिए हैं, तो यह मामला अनुचित प्रभाव और जबरदस्ती का भी बनता जा रहा है। इसके साथ ही प्रतिस्पर्धा कानून (Competition Act, 2002) का भी मामला है। विपक्ष का आरोप है कि कंपनियां जीएसटी कम होने के बहाने पीएम मोदी का राजनीतिक प्रचार कर रही है। सवाल उठता है कि यह कंपनियों के खुद का निर्णय है या वह किसी दवाब में हैं?

    नैतिकता के स्तर पर देखें, तो यह कहीं से भी नैतिक नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सत्ता और कॉरोपेरेट्स के बीच एक स्पष्ट दूरी होनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता है तो यह स्थिति भ्रष्टाचार और असमानता को बढ़ाने वाली होती है।

    जीएसटी काउंसिल ने जो छूट दी है, वह कोई मेहरबानी नहीं है। जनता की मांग थी. जीएसटी के कारण आम लोग पिछले सात सालों से परेशान थे।छोटे कारोबार ठप पड़ गए थे। उत्पाद बिक नहीं रहे थे। बाजार में रौनक नहीं थी। इतना सब होने और सहने के बाद अगर सरकार ने थोड़ी राहत दी है, तो इसका प्रचार सरकार कर सकती है. लेकिन कंपनियां? कंपनियां यह करने लगी है और सरकार इसे रोक नहीं रही है, बल्कि ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती दिख रही है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि सब सरकार की “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” अब ईज ऑफ डूइंग पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा” में बदलने जैसा है।

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