नई दिल्ली : भारत इन दिनों दुनिया के कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) कर रहा है, जिससे देश की व्यापारिक संभावनाएं बढ़ें — लेकिन इसी के साथ कुछ गंभीर आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं। हाल ही में सामने आए सरकारी आंकड़े और व्यापारिक घटनाक्रम इस दिशा में कई अहम सवाल खड़े करते हैं।

FTA के बाद व्यापार घाटा क्यों बढ़ा?
भारत ने अब तक 7 प्रमुख FTA (Free Trade Agreement) किए हैं। इन समझौतों के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि दो देशों या समूहों के बीच व्यापार आसान हो जाए, टैक्स कम लगें, और व्यापार बढ़े। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जिन देशों से भारत ने FTA किया है, उनमें से 71% देशों के साथ भारत को व्यापार में घाटा हो रहा है।
यह घाटा काफी गंभीर है, क्योंकि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। उदाहरण के लिए:
- यूएई (UAE) से भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़कर 16.8 अरब डॉलर से 26.8 अरब डॉलर हो गया।
- आसियान (ASEAN) देशों के साथ भी घाटा 21.8 अरब डॉलर से बढ़कर 45.2 अरब डॉलर हो गया।
- हालांकि ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत का घाटा कम हुआ है।
FTA के बाद भी इन देशों से भारत का आयात ज्यादा हो गया है, जबकि भारत का निर्यात उतना नहीं बढ़ पाया।
- जून 2025 में व्यापार घाटा कुछ कम जरूर हुआ
- सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 में भारत का व्यापार घाटा कुछ घटा है, जो एक राहत की खबर है।
- मई में यह घाटा 21.88 अरब डॉलर था, जो जून में घटकर 18.78 अरब डॉलर रह गया।
- जून में भारत का कुल निर्यात 35.14 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल जून से लगभग बराबर है।
- लेकिन आयात में 3.71% की गिरावट आई, जिससे घाटा घटा।
सेवा क्षेत्र (Service Sector) ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई, क्योंकि भारत ने इस क्षेत्र में 15.62 अरब डॉलर का सरप्लस दर्ज किया।
अमेरिकी ड्राई फ्रूट्स पोर्ट पर क्यों अटके हैं?
- एक नई समस्या सामने आई है – अमेरिका से आने वाले ड्राई फ्रूट्स (बादाम, अखरोट आदि) भारत के बंदरगाहों पर अटके हुए हैं। इसके पीछे दिलचस्प कारण है।
- भारत इन ड्राई फ्रूट्स पर 100% तक का आयात शुल्क लगाता है।
- आयातकों को उम्मीद है कि जल्द ही भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में इन पर 50% तक शुल्क कम हो सकता है।
- इसलिए वे फिलहाल इन ड्राई फ्रूट्स की क्लीयरेंस को जानबूझकर टाल रहे हैं, ताकि बाद में सस्ते शुल्क पर आयात कर सकें।
- इसके चलते बड़ी मात्रा में सूखे मेवे बंदरगाहों पर अटके पड़े हैं।
‘मांसाहारी दूध’ बना भारत-अमेरिका ट्रेड डील में रुकावट
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आया है – अमेरिकी डेयरी उत्पाद, खासकर वहां का ‘मांसाहारी दूध’।
- क्या होता है मांसाहारी दूध?
- अमेरिका में गायों को खिलाए जाने वाले चारे में मांस से बने उत्पाद मिलाए जाते हैं।
- इसमें सूअर, मछली, मुर्गी, घोड़े, बिल्ली, कुत्ते तक का मांस, खून और चर्बी तक मिलाई जाती है।
- इससे गायों का वजन बढ़ता है, लेकिन दूध शुद्ध शाकाहारी नहीं रहता।
भारत की आपत्ति क्यों?
भारत में दूध सिर्फ एक आहार नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा होता है। इसीलिए भारत सरकार ने अमेरिका से आने वाले ऐसे डेयरी उत्पादों पर आपत्ति जताई है। अमेरिका इस रुख को व्यापार समझौते में बाधा मान रहा है।
भारत को विदेशी व्यापार में आगे बढ़ना है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि:
1. FTA डील्स करते समय घरेलू उद्योगों और किसानों का हित सुरक्षित रहे।
2. अमेरिका जैसी ताकतवर अर्थव्यवस्था के साथ भी भारत को संस्कृति और उपभोक्ता हितों से समझौता नहीं करना चाहिए।
3. व्यापार घाटे को लगातार मॉनिटर किया जाए और FTA के लाभ-हानि का मूल्यांकन समय-समय पर हो।





























