झारखंड: झारखंड हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने लातेहार के एक मारपीट मामले में दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने प्रार्थी की याचिका स्वीकार करते हुए मामले को समाप्त कर दिया।
क्या कहा हाईकोर्ट ??
हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता प्रशांत उपाध्याय ने स्वयं माना है कि घटना के समय पुलिस अधिकारी वाहन जांच की ड्यूटी पर थे। ऐसे में, यदि ड्यूटी के दौरान अधिकारी द्वारा अधिकारों का अतिक्रमण भी हुआ हो, तब भी वह उसके आधिकारिक कार्य से जुड़ा माना जाएगा।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी /पुलिस अधिकारी के खिलाफ ऐसे मामलों में CrPC की धारा 197 के तहत पूर्व स्वीकृति (Sanction) जरूरी है।
हाईकोर्ट ने माना कि बिना सरकारी अनुमति के CJM द्वारा संज्ञान लेना कानूनन गलत था इसलिए अदालत ने इससे संबंधित शिकायतवाद की पूरी आपराधिक कार्यवाही और 2 अप्रैल 2024 के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।
क्या है मामला?
दरअसल, यह मामला गिरिडीह निवासी नागेश्वर महतो, जो पुलिस विभाग में सहायक अवर निरीक्षक (ASI) हैं, से जुड़ा था। उनके खिलाफ दर्ज एक शिकायतवाद में आरोप लगाया गया था कि वाहन जांच के दौरान उन्होंने एक युवक को रुकवाकर अपने अधीनस्थ सिपाही से पिटवाया और बाद में स्वयं भी मारपीट की। शिकायतकर्ता प्रशांत उपाध्याय ने यह भी आरोप लगाया कि उसे थाना ले जाकर हाजत में बंद कर पीटा गया। रात 10.30 बजे छोड़ा गया। इससे उसके शरीर पर चोटें और कान की सुनने की क्षमता प्रभावित हुई।
इस मामले में लातेहार के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) ने 2 अप्रैल 2024 को भारतीय दंड संहिता की धारा 323 के तहत संज्ञान लिया था, जिसे चुनौती देते हुए एएसआई ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।































